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न आरजू है न तमन्ना है कोई

उस हँसी को ढूँढ़िए

उसकी आँखें कुछ कहती हैं...

जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था

एक ग़ज़ल : झूठी आस बंधाने वाले

कभी अलविदा न कहना...

मोहब्बत...

मैं तो कहता हूँ वापस मत आना...!!!

तुम एक बार आकर समझा दो दिल को

वो ख़फ़ा है अब भी..!

आँखों में बसा ले मुझको

जग सूना-सूना लगता है

मेरी "माँ"

तेरे सिवा कुछ भी नहीं

ज़िंदगी को जुबान दे देंगे

सपने...

मुस्कुराना है मेरे होंठों की आदत में शुमार

हम तो यूं ही जिए जा रहे थे

... अभी रहने दीजिए..!

ज़िंदगी ; एक अधूरी प्यास