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तुम एक बार आकर समझा दो दिल को

ज़रूरत क्या थी..?

...बेखुदी नहीं आई!

थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे...

कोई दिल चुराए तो क्या कीजिए

सितम के बाद वक़्त आएगा वफाई का!

बहुत याद आया...

भीगी पलकों ने लूटा मेरा दामन!

तनहाइयों को अपना मुकद्दर बना लिया...

तकलीफ़ों के पुतले हैं हम...

ज़ज्बात!

अपना सबकुछ गंवा के बैठ गए...

आवाज दे गया...