ज़ज्बात!

तेरी खुशी के लिए हमने गम उधार लिए
जाने कितनी बार तेरी खातिर लुटा बहार दिए

तुझे रोशनी देने को जलाया दिल अपना
तेरी सलामती को खुद ही जां निसार किए


हर सांस रखा तेरे कदमों के नीचे
चिलमन हटाकर छिप-छिपके तेरे दीदार किए

नजर न आई तुझे इश्क इस दीवाने की
तूने कितनी बार इस मासूम के शिकार किए



राम कृष्ण गौतम "राम"

Comments

Creative Manch said…
तुझे रोशनी देने को जलाया दिल अपना
तेरी सलामती को खुद ही जां निसार किए


आह ~~~~
बहुत खूब ...... क्या बात है
महफ़िल लूट ली आपने
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आभार
तुझे रोशनी देने को जलाया दिल अपना
तेरी सलामती को खुद ही जां निसार किए

बहुत खूब
Anonymous said…
Ghazab ki poetry hai... Bahut sundar!
My World said…
Badhia. kamal ki lines hain.
ज़मीर said…
गजब, गजब,गजब......
राम भाई, आप तो छा गए.बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना.