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मैं जितना दूर जाता हूं वो उतना पास आता है

हम मिले हैं किसी न किसी मोड़ पर

तुम मेरे पास न आती तो बड़ा अच्छा था

जो कह न सके वही खलता रहा

कहां तक साथ दोगी तुम

हार जाऊं मैं वो सबकुछ जिसमें तेरी जीत हो

ये कविता उस लड़की पर

ये ऑफिस वाले नाते

वन चले राम रघुराई

जिसमें तू राजी उसी में मैं राजी

तीन क्षणिकाएं...

न आरजू है न तमन्ना है कोई

न मंदिर में सनम होते...