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तुम ज़माने में ज़माने से जुदा लगते हो

नववर्ष पर मासूमियत की फ़रियाद

मोहब्बत खुद बताती है

हस्ती...

इम्तेहान...

इंतज़ार

मुझे कुछ और कहना था...

रंज

इक ज़माना हो गया

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता

ये प्यारा सा जो रिश्ता है

यूं न मिल मुझसे...

कुछ इस तरह...