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तनहाइयों को अपना मुकद्दर बना लिया...

काँच की बरनी और दो कप चाय!

तकलीफ़ों के पुतले हैं हम...

कैसी है उलझन..?

माँ : ज़न्नत का एहसास...

तुम हो... तुम ही हो!!

ज़ज्बात!

उन अंधेरों की वज़ह मत पूछो..?

अपना सबकुछ गंवा के बैठ गए...

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में!

आवाज दे गया...

बेटे! 'बाघ' (1411) ऐसे होते थे..!!

मुनव्वर है तेरी खुश्बू से...