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मुझे पसंद नहीं है थकना!

भीगी पलकों ने लूटा मेरा दामन!

रामनारायण गौतम की किताब का प्रकाशन

हम... क्यों हैं इंसान..?

"नायिकाओं" को सलाम..!

गंगा मैया में जब तक कि पानी रहे... पर पता नहीं कब तक?

मैं और मेरी परछाई..?

तनहाइयों को अपना मुकद्दर बना लिया...

काँच की बरनी और दो कप चाय!

तकलीफ़ों के पुतले हैं हम...

कैसी है उलझन..?

माँ : ज़न्नत का एहसास...

तुम हो... तुम ही हो!!