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सौ बात की एक बात

आरजू है वफ़ा करे कोई

छोटा सा डैश

सोच के अनुसार सब होता नहीं है

फिर तेरे कान्हा को तुझसे पड़ा ज़रूरी काम

मन की खिड़की खोलके देखो

याद में उसकी रोते जाना ठीक नहीं

असाधारण होने की शर्त

मेरे हालात पे अब तो छोड़ दे मुझको

मैं असफल कहाँ हुआ?

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जब तुम दफ्तर में नहीं होती

या तो मैं न रहूं या उससे मुझे मोहब्बत न रहे