भूली बिसरी यादों को दोहराते जाना ठीक नहीं
बीत गई उन बातों को कहते जाना ठीक नहीं
नई चुनौती नई उम्मीदों नए दौर की बात करो
घिसे पिटे अफ़सानों को अब रटते जाना ठीक नहीं
सुना भी करो कुछ देर किसी की तुम गौतम
बस अपनी अपनी कहते जाना ठीक नहीं
खुशी सहेजो याद बुनो और आगे बढ़ो
वहीं चिपककर रुकते जाना ठीक नहीं
रखो ध्यान जो काम का हो या मतलब का
बेमतलब को ढोते जाना ठीक नहीं
तारीफ करो जो जायज हो और लाज़िम भी
फिजूल कसीदे गढ़ते जाना ठीक नहीं
करो मोहब्बत जीभर के तुम भी गौतम
याद में उसकी रोते जाना ठीक नहीं

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