मन की खिड़की खोलके देखो

मन की खिड़की खोलके देखो

हवा अभी भी मीठी है

नीरस स्वप्नों की चिलमन में

शेष अभी भी प्रीति है


इच्छाएं न कभी भी मरतीं

कभी न ये मन सोता है

जो होना है सो होना है

क्यों बेमतलब रोता है


ओढ़ चदरिया आसमान की

धरती पर तुम सो जाओ

जो जब जैसा जहां मिले 

तुम उसी भाव में खो जाओ


प्रेम नहीं मिलता यूं ही

ये जग स्वारथ का मेला है

जिस पर दिल आ जाए गौतम

बस उसके ही हो जाओ


• राम

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