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माँ कहती थी...

कहाँ तो तय था चरागा...

आवाज़...

पत्थर देवता हो जाएगा

बेटियाँ...

मैं बच्चा.. हूँ!

मैं और तुम...

माँ और उसका बेटा...

पांव की ज़ंजीर क्या है देख ले!

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपनी मर्ज़ी के हम हैं..?

दिवाकर पाण्डेय जी की कविताएँ

याद आती है माँ...