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पांव की ज़ंजीर क्या है देख ले!

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपनी मर्ज़ी के हम हैं..?

दिवाकर पाण्डेय जी की कविताएँ

याद आती है माँ...

मेरी 'जानेमन'!

मैं एक झरना हूँ...

ज़रूरत क्या थी..?

...बेखुदी नहीं आई!

दुआ दो मुझे भी ठिकाना मिले...

थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे...

जिंदगी... एक कविता!

कोई दिल चुराए तो क्या कीजिए