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"नायिकाओं" को सलाम..!

गंगा मैया में जब तक कि पानी रहे... पर पता नहीं कब तक?

मैं और मेरी परछाई..?

तनहाइयों को अपना मुकद्दर बना लिया...

काँच की बरनी और दो कप चाय!

तकलीफ़ों के पुतले हैं हम...

कैसी है उलझन..?

माँ : ज़न्नत का एहसास...

तुम हो... तुम ही हो!!

ज़ज्बात!

उन अंधेरों की वज़ह मत पूछो..?

अपना सबकुछ गंवा के बैठ गए...

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में!