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हार जाऊं मैं वो सबकुछ जिसमें तेरी जीत हो

ये कविता उस लड़की पर

ये ऑफिस वाले नाते

वन चले राम रघुराई

जिसमें तू राजी उसी में मैं राजी

तीन क्षणिकाएं...

न आरजू है न तमन्ना है कोई

न मंदिर में सनम होते...

हर एक बात पे रोना आया

उस हँसी को ढूँढ़िए

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं

इतना भी भावविभोर नहीं

जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई...