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जिसमें तू राजी उसी में मैं राजी

तीन क्षणिकाएं...

न आरजू है न तमन्ना है कोई

न मंदिर में सनम होते...

हर एक बात पे रोना आया

उस हँसी को ढूँढ़िए

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं

इतना भी भावविभोर नहीं

जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई...

ऐ मेरे हमनशीं चल कहीं और चल

तो काहे का मैं

बाजारू नियम अब संबंधों पर भी लागू

वक्त के धरातल पर