वक्त के धरातल पर

वक़्त के धरातल पर
जम गई हैं
दर्द की परतें
दल-दल में धंसी है सोच
 
मृतप्रायः हैं एहसास
पंक्चर है तन
दिशाहीन है मन
हाड़मांस का
पिंजरा है मानव
इस तरह हो रहा
मानव समाज का निर्माण

अब
इसे चरित्रवान कहें
या चरित्रहीन
कोई तो बताए
वो मील का पत्थर
कहाँ से लाएं
जो हमें
'गौतम' 'राम' 'कृष्ण'
की तरह राह दिखाए..?

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