तो काहे का मैं



किसी बेईमान की आँखों में
न खटकूँ तो काहे का मैं

मित्रों को गाढ़े में याद न आऊँ
तो काहे का मैं

कोई मोहब्बत से देखे और मैं उसके
सीने में सीधे न उतर जाऊँ

तो काहे का मैं
अगर यह सब कविता में तुम्हें

सिर्फ़ सुनाने के लिए सुनाऊँ
तो फिर काहे का मैं।

• केशव तिवारी

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