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खुद से डर गया हूँ मैं...

दर्द के सिवाय कुछ नहीं!

कुछ चुभ रहा है..!

सफर भी लगे अब फसाने के जैसे!

चेहरे पे खराशें हैं, आइना बदलते हैं

बचपन का ज़माना होता था

शायद ज़िंदगी बदल रही है

कोई चाहत, कोई हसरत भी नहीं

उनकी चाह, हमारा गुरूर

दो कदम तो साथ चलने दो

चाहता हूं कि अब बरस जाओ!

माँ कहती थी...

कहाँ तो तय था चरागा...