ज़रूरत क्या थी..?

यूं हमको सताने की ज़रूरत क्या थी
दिल मेरा चुराने की ज़रूरत क्या थी

जो नहीं था इश्क़ तो कह दिया होता
होश मेरे उड़ने की ज़रूरत क्या थी

मालूम था अगर ये ख़ाब टूट जाएगा
नींदों में आकर जगाने की ज़रुरत क्या थी

मान लूं अगर ये एकतरफा मोहब्बत थी
फिर मुझे देखकर मुस्कुराने की ज़रुरत क्या थी

Comments

Shikha Deepak said…
badhiya likhte hain aap........sunder rachna.
kshama said…
मालूम था अगर ये ख़ाब टूट जाएगा
नींदों में आकर जगाने की ज़रुरत क्या थी
Bada anokha andaaz hai!
बहुत लाजवाब.

रामराम.
kunalkishore said…
aapki dastak maine padhi, likha hai dastak hausla degi
kehna chahta hu accha likha hai appne
bahut khub
bt aap wo chij ho jinhe hausla nhi hausle ko aapki darkar hogi
jiyo