
कोई आवाज सी आई तो लगा तुम हो
कहीं से फूल महकाई तो लगा तुम हो
जिरह करते रहे हर पल, बुराई की नहीं तेरी
जो आंधी जज्बात की आई तो लगा तुम हो
कसीदे कसते रहे लोग मुझ पर हर घड़ी हर पल
कहीं संवेदना छाई तो लगा तुम हो
बगीचे सूख जाते हैं जो माली रूठ जाता है
कहीं जो शाम गरमाई तो लगा तुम हो
तसब्बुर भी मेरा अब हर घड़ी तुम पर ही आता है
हकीकत भी जो घर आई तो लगा तुम हो
यकीं है मुझे तुमसे मिलूंगा मैं कहीं एक दिन
मुझे फिर देखके जो वो मुस्काई तो लगा तुम हो...
राम कृष्ण गौतम "राम"
Comments
कहीं से फूल महकाई तो लगा तुम हो
.nice
हकीकत भी जो घर आई तो लगा तुम हो..
Great... Gud Going...
कहीं संवेदना छाई तो लगा तुम हो
waah!
bahut achchha likhte ho Gautam.
khyaal achche hain.
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aaj post ka presentation bhi bahut achchha hai
वैसे कोई भी लेखन अच्छा तभी बनता है जब अच्छा पढने वाले मिलें!! बात मेरी लेखनी में नहीं, आप लोगों की निगाहों में है!!!
Vaise achchha likhte ho!!