होश की लाचारी से पागलपन की बेकारी भली



जाने क्या सोचता रहता हूं
हर वक़्त हर पल
बस सोचता ही रहता हूं
पल के भी अनंत हिस्से में
न जाने कितने अनगिनत
विचार आते हैं मन में
कभी कभी तो खुद को 
किसी पागल की तरह
महसूस करता हूं
लेकिन पागलपन का
ये अनुभव
मुझे देता है
एक अनुपन शांति
लेकिन जब मैं फिर
होश में आता हूं
तो देखता हूं कि
एक बार फिर
मैं उसी जगह
आ पहुंचा हूं जहां
घोर सन्नाटा है
और एक बार फिर
मैं लाचार हो जाता हूं
और फिर सोचने के अलावा
कुछ नहीं कर पाता
बस सोचता ही रहता हूं
न जाने क्या-क्या
फिर मैं सोचता हूं कि
होश की इस लाचारी से
पागलपन की वो
बेकारी भी
कम से कम
उस लाचारी में मैं
शांति का अनुभव
तो कर पाता हूं

• राम

Comments

Jayram Viplav said…
युवा मन का जीवंत चित्रण किया है आपने . अक्सर हमारे -आपके जीवन में ऐसा ही कुछ होता है . दिमाग में चाल रहे केमिकल लोचा इस हद से गुजर जाता है कि सच वो पागलपन वो मुफलिसी ही हमें अच्छी लगने लगती है . किसी के प्यार में पागल , देश की चिंता में पागल ,समाज की स्कोह में पागल , अधिक से अधिक सफलता पाने की सोच में पागल आज हर कोई पागल ही तो है . युवापन में यह सनक तो होती ही है जिसे हम सभी महसूस करते हैं .
My World said…
ग़ज़ब का पागलपन है भाई! वैसे मैं भी कभी काभी अपने अन्दर ऐसा ही पागलपन महसूस करता हूँ!
PEHLI BAAR BLOG PAR AAYA HOON BEHTREEN BLOG HAI GAUTAM JI
PLZ VISI MY BLOG AADAT MUSKURANE KI


http://sanjaybhaskar.blogspot.com