जाने क्या सोचता रहता हूं
हर वक़्त हर पल
बस सोचता ही रहता हूं
पल के भी अनंत हिस्से में
न जाने कितने अनगिनत
विचार आते हैं मन में
कभी कभी तो खुद को
किसी पागल की तरह
महसूस करता हूं
लेकिन पागलपन का
ये अनुभव
मुझे देता है
एक अनुपन शांति
लेकिन जब मैं फिर
होश में आता हूं
तो देखता हूं कि
एक बार फिर
मैं उसी जगह
आ पहुंचा हूं जहां
घोर सन्नाटा है
और एक बार फिर
मैं लाचार हो जाता हूं
और फिर सोचने के अलावा
कुछ नहीं कर पाता
बस सोचता ही रहता हूं
न जाने क्या-क्या
फिर मैं सोचता हूं कि
होश की इस लाचारी से
पागलपन की वो
बेकारी भी
कम से कम
उस लाचारी में मैं
शांति का अनुभव
तो कर पाता हूं
• राम

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