हमने उनको अपने शब्दों में
कितना अनुपम रूप लिखा
कभी प्रिय, कभी प्रियतम और
कभी सर्वोत्तम स्वरूप लिखा
कभी दुआ लिखी कभी दवा लिखी
कभी युग युग का संबंध लिखा
कभी जीवन का उद्देश्य लिखा
कभी आत्मा का अनुबंध लिखा
उनकी साधारण दस्तक को भी
कितना विशेष आभास लिखा
उनके रूखे व्यवहार को भी
हमने कोमल एहसास लिखा
उनकी खामोशी के अर्थ लिखे
उनके छल को अंदाज़ लिखा
जो महज़ आम सा परिचय था
उसे परम सुखद संवाद लिखा
लेकिन क्या हमसे भूल हुई
कुछ चूक हुई कोई पाप हुआ
वो गिरे नजर से यूं धड़ाम
और ये सब अपने आप हुआ
वो कोई अनूठी मिसाल नहीं
ना कोई दुर्लभ संयोग रहे
हमने नायाब जिसे समझा
वो भीड़ में शामिल लोग रहे
हमने जिनको सोना समझा
वो पीतल से भी कमतर है
हमको ही जबरन लगता था
वो सबसे ज़्यादा बेहतर है
ना जाने क्या मजबूरी थी
जो इतना नीचे गिर गए वो
बेवजह अकारण बेमतलब
तुच्छ आचरण कर गए वो
फिर भी ना कोई शिकायत है
ना शब्दों में प्रतिशोध कोई
बस विस्मित और अचंभित हूं
अब रहा ना हमको बोध कोई
हमने बस मन के भाव लिखे
उनका वास्तविक परिचय नहीं
शब्दों की गरिमा क्यों तोड़ूं
अब बस वो मेरा विषय नहीं
हम अब भी लिखेंगे गुल-गुलशन
प्रेम के नए प्रतिमान लिखेंगे
मगर किसी को प्रिय लिखने से पहले
उसके आचरण का प्रमाण लिखेंगे
• रामकृष्ण गौतम, भोपाल

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