धीरे-धीरे हम भी दुनिया का हुनर सीख गए



धीरे-धीरे हम भी दुनिया का हुनर सीख गए
वरना हर झूठ को सच मानने की आदत थी

जो क़सम खाते हैं, वो वक़्त पे मुकर जाते हैं
कभी हर शख़्स में भगवान की इनायत थी

अब किसी बात पे दिल में शिकन नहीं होती
कभी हर बात पर शिकायत थी

कौन अपना है, ये हालात बता देते हैं
हमें जिस्म नहीं, वक़्त की बस चाहत थी

अब न वादों पे यक़ीं है, न दिलासों पे भरोसा
कभी लफ़्ज़ों से भी रिश्तों की हिफ़ाज़त थी

• रामकृष्ण गौतम, भोपाल

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