समझदारी ज़िंदगी को बेरंग बना देती है



समझदारी ज़िंदगी को बेरंग बना देती है
रंग भरने को थोड़ी नादानियां किया करो

हर बात को तर्कों की तराज़ू पर न तौलो
कभी बेवजह भी दिल की मान लिया करो

हर रोज़ कहाँ मिलती है सौगात खुशियों की
कभी फिजूल की बात पर भी संज्ञान लिया करो

कुछ ख़्वाब हक़ीक़त के मोहताज नहीं होते
कुछ ख़्वाब आंखों में भी पाल लिया करो

हर रिश्ता कहाँ माँगता है हिसाब उम्रभर का
कभी बेवजह भी किसी का ख़याल किया करो

ये वक़्त लौटकर फिर आने वाला नहीं है
कुछ लम्हे अपने लिए भी निकाल लिया करो

• रामकृष्ण गौतम, भोपाल

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