और धीरे-धीरे करके



और धीरे-धीरे करके हमने सीख ही ली दुनियादारी
कभी हर क़सम खाने वाले को सच्चा मान लेते थे

जो ज़ुबां से जान देते थे, वही मुंह पे मुकर गए
और हम एक आवाज़ पर ही उठा आसमान लेते थे

बड़ी शिद्दत से निभाते गए हर इक रिश्ता नाता
किसे मालूम था, हम ख़ुद को ही नुक़सान देते थे

अब किसी की नकली बातों पर हंसकर निकल जाते हैं
कभी हम झूठ को भी उनका एहसान मान लेते थे

अब शिकवा, न कोई आस, न कोई शिकायत है
कभी हम रूठकर भी निस्बत को मान देते थे

• रामकृष्ण गौतम | Ramkrishna Gautam

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