कैसे तुम्हें सुनाऊँ मैं अंतर्मन का नाद
शब्दों के वन सूख गए, मौन हुआ संवाद
मन की वीणा टूटी फिर भी गाती रही तेरा राग
भीतर जलता दीप है, लेकिन बाहर फैली आग
आँखों में संचित हुई जन्मों की बरसात
होठों पर ठहरी रही एक अधूरी बात
धूप बहुत सी ओढ़कर चलता रहा शरीर
मगर आत्मा ढूंढ़ती होके तुझे अधीर
कैसे कहूँ वो भाव मैं जो शब्द में ढल न पाए
जैसे गीता बीच रण अर्जुन समझ न पाए
स्मृतियों के शंख में गूँजे गहन विलाप
जैसे सूने गर्भगृह भटक रहा आलाप
तुम यदि थोड़ी देर को खोलो मन का द्वार
मैं अपने हर घाव का कर लूं अब श्रृंगार
या फिर मैं तौबा करूं कर लूं कुछ आघात
तब शायद तुम जान सको मेरे मन की बात
• रामकृष्ण गौतम, भोपाल

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