यूं कब तलक अपनी बेचैनियां छुपाओगे
कभी न कभी तो हमारे सामने आओगे
हम नहीं कहते किसी से शिद्दत हमारी
कभी न कभी तुम खुद ही समझ जाओगे
लब ख़ामोश हैं, मगर आँखें गवाही देती हैं
अनकहे जज़्बातों को कब तलक दबाओगे
इक रोज़ तुम्हें भी एहसास होगा मेरी चाहत का
जब भीड़ में होकर भी तन्हा नज़र आओगे
• राम कृष्ण गौतम
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