बेवज़ह ही हमको सताने में लगे हैं
ये कौन सा सुकून वो पाने में लगे हैं
बक्शी है क्या ज़रा सी नज़ाकत उन्हें रब ने
खुद को ही खुदा बताने में लगे हैं
कितना गिरेंगे आज वो अपने मेयार से
दुश्मन की तरह हमको जलाने में लगे हैं
औरों को रुलाकर भी उन्हें शर्म न आए
किस बात का वो जश्न मनाने में लगे हैं
कर देंगे खत्म उन्हें उनके कर्म ही एक दिन
वो किस तरह खुद को ही गिराने में लगे हैं
मैं क्या बताऊं कितनी सदियां मुझे यहां
मरहम मेरे जख्मों पे लगाने में लगे हैं
• रामकृष्ण गौतम
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