यूं न मिल मुझसे...

यूं न मिल मुझसे ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज-ऐ-सबा हो जैसे

लोग यूं देख के हंस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूं न मिल हमसे खुदा हो जैसे

मौत भी आएगी तो इस नाज़ के साथ
मुझ पे एहसान किया हो जैसे

ऐसे अनजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे

हिचकियाँ रात को आती हैं बहुत
तूने फिर याद किया हो जैसे

ज़िन्दगी बीत रही अब "गौतम"
एक बेज़ुर्म सज़ा हो जैसे...

Comments

vandana gupta said…
उफ़ ……………बहुत शानदार गज़ल्।
sudeepmirza said…
क्या बात है ....