हम तो यूं ही जिए जा रहे थे

ज़िंदगी में दो घड़ी मेरे पास न बैठा कोई
और आज सब मेरे पास बैठे जा रहे थे


कोई तोहफा न मिला आज तक मुझे "गौतम"
मगर आज सब फूल ही फूल दिए जा रहे थे

तरस गए हम किसी के हाथ से दिए एक कपड़े को
और आज नए-नए कपड़े पहनाये जा रहे थे

दो कदम साथ चलने को कोई तैयार न था
और आज काफिला बना के लिए जा रहे थे

आज मालूम हुआ कि मौत इतनी हसीन होती है
कम्बख्त हम तो यूं ही जिए जा रहे थे

Comments

बहुत खूब ...सही है जिन्दा रहते तो किसी के पास वक्त नहीं होता दो घडी बैठने का ..
Shubham Jain said…
bahut achchi kavita...yatharth hai ye
prerna argal said…
bilkul jindagi ki sachchai ko batati hui dil ko choonewali rachanaa.jinda main koi nahi poochataa marane ke baad "padamshree""padambhusan" se vibhushit kar diyaa jaata hai. badhaai aapko.



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