एक दिन जब मेरे अंदर
इकट्ठी हो गई आग
सोचा सूरज बन जाऊं
एक दिन जब मेरे दर्द
बन गए आंसू
सोचा समंदर बन जाऊं
एक दिन जब मैं
झरने से नदी और
नदी से हो गया समुंदर
सोचा आकाश बन जाऊं
एक दिन जब इच्छाओं
के रंग बन गए इंद्रधनुष
सोचा तितली बन जाऊं
एक जब मुखर हुईं
मेरी संवेदनाएं
सोचा वाल्मीकि बन जाऊं
अब मेरे हाथ में कलम है
सोचता हूं क्यों न
कवि बन जाऊं
• ॐ

Comments
-koi baat nahin ab yahan nayee post likhiye.