ये कैसी चुप-चाप मोहब्बत






तेरी मेरी प्रीत निराली
सबको ये अकुलाय रही है
ना कोई आस ना कोई चाहत
फिर भी मन को भाय रही है

ना कोई बंधन ना कोई वादा
फिर भी साथ निभाए रही है
बिन बोले ही बिन सोचे ही
धड़कन खुद ही बताय रही है

ना मिलने की कोई बेचैनी
ना विरहा तड़पाय रही है
ये कैसी चुप-चाप मोहब्बत
खुद से खुद को छिपाय रही है

ना नामो में ना रिश्तों में
फिर भी अर्थ बनाए रही है
कैसी निर्मल सी उलझन है
मन ही मन मुस्काय रही है

‘गौतम’ ये संबंध अनोखा
नामों में ना समाय रही है
राधा-कृष्ण सी प्रीत ये प्यारी
अधूरी है पर लुभाय रही है

• राम कृष्ण गौतम

Comments