तुम किताबों सी बिल्कुल मत बनना



तुम किताबों सी बिल्कुल मत बनना
कुछ भी हो मौन की राह बिल्कुल मत चुनना
कम से कम मुझे बताना मन में जो भी हलचल हो
अकेले अकेले कोई फिजूल राग बिल्कुल मत गुनना

क्या हुआ जो दिल बेचैन और लब खामोश होते हैं
क्या हुआ जो आंख कभी बेवजह ही रोते हैं
तेरे इन बोझिल पलों को हल्का हम कर देंगे न
बस तू चुप मत रहना किसी की बिल्कुल मत सुनना

ये जो ज़िंदगी का हिसाब है कभी असलियत कभी ख्वाब है
कभी मांगने से भी मिले न जो वही बाद में बेहिसाब है
जब लगे तुझे अब कुछ नहीं वही वक़्त तो लाजवाब है
बस मुझसे कहना कोई कागजी ख्वाब बिल्कुल मत बुनना

• राम

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