शब्दों में हमने साँसें रख दीं
जैसे कोई दीप हवा से बचाकर रखता है
रात हमारी मेज़ पर झुकी रही,
और हम कागज़ पर झुककर
अपना दिल उतारते रहे
लोग...
बहुत मिले पर चेहरे ज़्यादा थे, रिश्ते कम
हर मुस्कान में हिसाब था
हर अपनापन शर्तों पर टिका है
सब थके हुए हैं भीतर से
होठों पे हँसी आती ही नहीं है
सपने...
अब वो भी शायद हमें भूल गए
उम्र गुजरती जा रही है
जैसे कोई ट्रेन बिना रुके स्टेशन से निकल जाए
नींद…
वो तो बस दूसरों की आंखों में बसती है
हमारी आंखों में आने की उसे फुर्सत कहां है
नियति...
वही पुराना गीत गाती रहती है
जिसके बोल सिर्फ दर्द हैं
दुख...
अब मेरे कमरे का स्थायी मेहमान बन गया है
हर रात किसी पुराने रिश्तेदार की तरह सिरहाने बैठकर
ठोकरों की गिनती करवाता रहता है
हमने भी दुख को नहीं भगाते
उसे भीगने देते हैं, फिर निचोड़ते हैं
और उन्हीं बूंदों से शब्द बनाते हैं
रोशनी...
साथ नहीं चलती हमेशा
पर हाथ कभी कलम नहीं छोड़ते
पैरों में छाले पड़े
कदम डगमगाए
पर रुकना हमें आया ही नहीं
जो कभी पीड़ा थी
अब वही गीत बन गई
जो घाव भीतर थे
अब वही कविता में उतर आए
हम हारते नहीं लिखते हुए
बस हर पंक्ति में थोड़ा और खुल जाते हैं
और जो लोग समझते हैं
कि ये कविता है
उन्हें क्या पता
ये तो रात भर रोती हुई आत्मा की आवाज़ है...
इसीलिए तो हमें अपनी लेखनी पर नाज़ है !!!
• राम कृष्ण गौतम

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