नीरस सी ज़िंदगी को
रस लेके हमने काटा
कभी दाल न सकी गल
कभी गीला हुआ आटा
शिद्दत हमारी देखो
सब सह गए खुशी से
कभी उफ नहीं किए हम
चाहे हो कितना घाटा
धीरज बनाए रक्खा
रस्ता कभी न छोड़ा
कभी मां की मार खाई
अक्सर पिता ने डांटा
हंसते रुलाते जीवन
लाया नई सदी में
जहां भूख से भी मंहगा
महीने का अपना डाटा
अरे उलझनें तो देखो
डिजिटल हुए पड़े हैं
जहां जानें क्या मुनाफा
और जानें क्या है घाटा
अब ताल्लुकों के माने/मायने
बस लाइक शेयर करना
जब आए कोई मौका
बस दूर से है टाटा
• राम

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