सुनो,
अब तक सहेज रखे हैं मैंने
असीम अखंड अंबर सी स्मृतियां तुम्हारी
जैसे तुम ही रची हो बसी हो मेरी रग-रग में
जाने कितने अरसे बीते
हमको तुमसे मिले
तुम्हें निहारे तुमसे बातें किए
फिर भी न जाने क्यों
तुम्हें बिसराने में इतनी
जटिलता क्यों हो रही है
अभी भी पाता हूं
स्वयं में तुम्हारा वो पुराना प्रेम
जो अनंत था तुमसे कभी
अभी भी भिगो लेता हूं
बच्चों की तरह आंखें
तुम्हारे विरह की वेदना में
ऐसा नहीं कि प्रेम दोबारा नहीं मिलता
ये तो हृदय ही विद्रोही है
किसी को स्वीकारता नहीं बार-बार
सुनो,
एक बार पुनः लौट आओ न
तुम्हें हृदय से लगाकर
बिसराना चाहता हूं
तुम्हारे प्रेम को
तुम्हारी चाह को
तुम्हारे स्पर्श को
तुम्हारी स्मृतियों को
तुम्हारे विछोह को
और तुम्हें भी
सदा सदा के लिए
• राम

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