तुमसे संवाद की भाषा



तुमसे संवाद की

जो भाषा मैं जानता हूं 

उसकी लिपि मुझसे

खो गई है


इसलिए हृदय की कई बातें

लिखकर बताता हूं तुमको


फिर भी भय बना रहता है

कि कहीं कोई शब्द कोई भाव

न दे दे तुम्हारे मन को घाव


किंतु मैं ये सब जानकर नहीं करता

मन कहता है कर देता हूं

खाली गागर भर देता हूं

और मेरा मन ये तो नहीं चाहेगा

कि जिसे वो चाहता है उसे घाव दे


अब तुम भी कुछ कह दो

मुझको न इतना सह दो

जो कह दोगी वो मानूंगा


बस इतना बता देना

थोड़ा सा पहले जता देना

जो कहोगी वो मन से कहोगी


आखिर में...

बस इतना है कहना

तुमसे मेरा नाता पुराना

समझ नहीं सकता ये जमाना

किससे कहना क्यों है बताना

तुम जो कहो तो मांगूं तुमसे

आज मैं एक सौगात

जीवनभर तुम खुश रहना

खुद को रखना आबाद

समय मिले जो कभी तो

हमको हृदय में रखना याद

• राम (साभार)

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