कृष्ण को राधा के विरह की वेदना सता रही है



कृष्ण को राधा के विरह की वेदना सता रही है

हृदय में कोई चुभन है जो खलबली मचा रही है

यमुना तट पर उमड़ रहीं स्मृतियों की ऊंची लहरें

राधा के अधरों की अधूरी मुस्कान तड़पा रही है

मुरली की तान सुनकर वो बेचैन हो जाने वाली

आज न जाने क्यों कान्हा को अधीर बना रही है

चांदनी रात में भी घनघोर अंधकार क्यों छाया है

शीतल हवा भी तन-मन को जला रही है

राधिका के स्मरण की यह मीठी सी वेदना

कृष्ण के सीने में आग की लपटें भड़का रही है

वो बंसी जो अक्सर गूंजती है कुंज गलियों में

आज उसकी धुन क्यों गूंगी हो जा रही है

आत्मा को भेद रहे हैं राधा की विरह के शूल

कान्हा व्याकुल है बेकल है बेकरार है

हृदय के भीतर कैसी बेचैनी छा रही है

• राम

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