बांसुरी की पीड़ा



नाम तुम्हारा करुणा सागर
काम तुम्हारा अग्नि परीक्षा
झुककर नहीं चलूंगी तनकर
ऐसी है मेरी गुरुदीक्षा

संघर्षों से छेद छेद कर
बना दिया है मुझे बांसुरी
अंगुली रखते ही गुजंगी
पर न जपूंगी नाम तुम्हारा

सारे संकट रही झेलती
मैंने तुमको नहीं पुकारा
हां हां बहुत ढीठ निकली मैं
अब मत देना जनम दोबारा

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